पिछले कुछ दशकों में विज्ञान ने मानव जीवन को पहले से कहीं ज्यादा लंबा और स्वस्थ बना दिया है। एंटीबायोटिक्स, वैक्सीन और आधुनिक दवाओं की वजह से औसत उम्र कई गुना बढ़ गई है। लेकिन आज बायोलॉजी और फिजिक्स की रफ्तार इतनी फ़ास्ट है कि वैज्ञानिक सोच रहे हैं—क्या हम सिर्फ उम्र बढ़ाने तक ही रुकेंगे, या कभी मृत्यु को भी पीछे छोड़ देंगे?
मॉर्गन फ्रीमैन के मशहूर शो Through the Wormhole में प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी मिचिओ काकू ने एक बहुत ही मज़ेदार बात बताई थी। उन्होंने कहा कि इस ब्रह्मांड की हर चीज पर थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम लागू होता है। इस नियम के मुताबिक किसी भी बंद सिस्टम में एंट्रोपी हमेशा बढ़ती है। एंट्रोपी मतलब अव्यवस्था या डिसऑर्डर। यानी चीजें नई से पुरानी होती हैं, जंग लगती है, सड़ती हैं और अंत में खत्म हो जाती हैं। हमारा शरीर भी इससे अलग नहीं है। जन्म के समय कोशिकाएं समान्य होती हैं, युवावस्था में शरीर चरम पर होता है, फिर धीरे-धीरे गलतियां जमा होती जाती हैं और अंत में मौत आ जाती है। यही एंट्रोपी का सिद्धांत है।
लेकिन वैज्ञानिकों ने इस नियम में एक बड़ा लूपहोल ढूंढ निकाला है। थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम strictly बंद सिस्टम पर लागू होता है। अगर सिस्टम खुला हो—यानी बाहर से ऊर्जा आ रही हो—तो स्थानीय एंट्रोपी को कम किया जा सकता है। बस शर्त यह है कि कहीं और एंट्रोपी और ज्यादा बढ़ जाए। फ्रिज का उदाहरण लीजिए। फ्रिज अंदर ठंडा रखता है (एंट्रोपी कम करता है), लेकिन बाहर गर्मी छोड़ता है (एंट्रोपी बढ़ाता है)। कुल मिलाकर ब्रह्मांड की एंट्रोपी बढ़ती रहती है।
मिचिओ काकू के अनुसार यही लूपहोल इंसानों पर भी लागू हो सकता है। उम्र बढ़ना असल में कोशिकाओं में गलतियों का जमा होना है—डीएनए में ख़राबी, माइटोकॉन्ड्रिया में ऑक्सीडेटिव डैमेज, और जंक प्रोटीन का इकट्ठा होना। अगर हम बाहर से ऊर्जा और तकनीक लगाकर इन गलतियों को ठीक कर सकें, तो शरीर की एंट्रोपी को कम किया जा सकता है। जैसे ऑस्कर वाइल्ड की कहानी द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे में—मुख्य पात्र हमेशा जवान रहता है, लेकिन उसकी तस्वीर बुढ़ाती जाती है। कुल एंट्रोपी बढ़ती है, लेकिन व्यक्ति युवा रह जाता है।
आज वैज्ञानिक इसी दिशा में काम कर रहे हैं। टेलोमेरेस को लंबा रखने वाली थेरेपी, सेनोलिटिक दवाएं जो बुढ़ापे वाली कोशिकाओं को हटाती हैं, जीन एडिटिंग (CRISPR) से डीएनए की मरम्मत, और कैलोरी रिस्ट्रिक्शन जैसी विधियां शरीर में एंट्रोपी के बढ़ने की रफ्तार को धीमा कर रही हैं। कुछ शोध बताते हैं कि अगर मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित किया जाए तो एंट्रोपी जनरेशन कम होती है और उम्र बढ़ सकती है। ग्रीनलैंड शार्क जैसे जीव सैकड़ों साल जीते हैं क्योंकि उनका मेटाबॉलिज्म बहुत धीमा है—गलतियां धीरे जमा होती हैं।
भविष्य में शायद हम बायोलॉजिकल इमॉर्टैलिटी या डिजिटल इमॉर्टैलिटी की तरफ बढ़ें। शरीर की मरम्मत लगातार हो, या दिमाग की जानकारी को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखा जाए। लेकिन याद रखें—पूर्ण अमरता अभी दूर है। एंट्रोपी पूरी तरह उलटना आसान नहीं, क्योंकि कुछ नुकसान अपरिवर्तनीय होते हैं। फिर भी विज्ञान साफ कहता है कि मौत का कोई अनिवार्य भौतिक नियम नहीं है। जैसा रिचर्ड फेनमैन ने कहा था—“बायोलॉजी में अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं मिला जो मौत को अनिवार्य साबित करे।”
अगर वैज्ञानिक सही दिशा में आगे बढ़ते रहे, तो आने वाले दशकों में औसत उम्र 100, 120 या उससे भी ज्यादा हो सकती है। एंट्रोपी का लूपहोल हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के नियमों के अंदर भी संभावनाएं छिपी हैं। बस जरूरत है सही ऊर्जा, सही तकनीक और सही समझ की। मृत्यु के साथ धोखा करना अभी विज्ञान कथा लगता है, लेकिन थर्मोडायनामिक्स खुद कहता है—यह असंभव नहीं।
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